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मौत कैसे होती है — एक एहसास, एक सच्चाई

मौत कैसे होती है — एक एहसास, एक सच्चाई

यह कोई कहानी नहीं है।

यह मेरा दर्द है।

यह वह है जो मैंने अपनी आँखों से देखा…

और अपने दिल से महसूस किया।

सुबह का समय था।

चलते-चलते कुछ मुर्गों की आवाज़ें सुनाई दीं।

वे आवाज़ें सामान्य नहीं थीं—

वे डर से भरी हुई थीं।

मेरा दिल मुझे रोक नहीं पाया।

मैं बाज़ार की ओर चल पड़ी।

वहाँ भीड़ थी, शोर था, सौदेबाज़ी थी—

सब कुछ सामान्य लग रहा था।

लेकिन एक टोकरी…

उस टोकरी ने मेरी आत्मा को हिला दिया।

उसमें कई मुर्गे कैद थे।

वे एक-दूसरे की ओर देख रहे थे।

उनकी आँखों में डर था,

उम्मीद थी,

और एक ख़ामोश प्रार्थना थी।

मुझे ऐसा लगा जैसे वे पूछ रहे हों—

“हमने क्या गलती की है?”

ज़िंदगी का डर

सिर्फ़ इंसानों को ही नहीं होता।

पशु भी महसूस करते हैं।

उनके लिए भी ज़िंदगी उतनी ही कीमती होती है।

अचानक एक मुर्गे को पकड़ा गया।

उसकी गर्दन मरोड़ दी गई।

एक ही झटके में—

ज़िंदगी खत्म।

भीड़ इकट्ठा हो गई।

किसी की आँखों में आँसू नहीं थे।

किसी के दिल में दर्द नहीं था।

सिर्फ़ एक ही सवाल था—

“कितना किलो?”

उसी पल मुझे एहसास हुआ—

हम सिर्फ़ मांस नहीं खरीद-बेच रहे,

हम अपनी संवेदनाएँ भी बेच रहे हैं।

मैंने धीमे से पूछा—

“अगर आपको कोई चाकू मार दे,

तो आप अस्पताल क्यों दौड़ते हैं?”

वह व्यक्ति चुप रह गया।

उसका सिर झुक गया।

क्योंकि सच

हर बार जवाब नहीं माँगता।

कभी-कभी

ख़ामोशी ही सब कुछ कह देती है।

यह लेख क्या नहीं है?

यह लेख मांस खाने या न खाने की बहस नहीं है।

यह लेख क्या है?

यह लेख है—

महसूस करने का।

दूसरे के दर्द को समझने का।

इंसान बने रहने का।

क्योंकि

जब हम दूसरे की पीड़ा नहीं समझते,

तो हम धीरे-धीरे

इंसान होना भूल जाते हैं।

💭 सोचने के लिए एक पंक्ति:

ज़िंदगी किसी की भी हो, दर्द एक जैसा होता है।

सच्ची घटना पर आधारित

✍️ लेख: डिंपल गोयल

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